Dec 5, 2015

मोदी के कारण रेडियो श्रोताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है

डॉ. कठेरिया के नेतृत्व में वर्धा शहर के रेडियो श्रोताओं पर हुआ शोध

जागरूकता बढ़ाने में रेडियो कारगर : अध्ययन में प्राप्त 87 प्रतिशत आंकड़े यह दर्षाते हैं कि रेडियो जन-जागरूकता बढ़ाने में महत्वपर्णू भूमिका अदा कर रहा है। 53 प्रतिशत प्रतिभागी मानते हैं कि सरकारें रेडियो का उपयोग अपने पक्ष में जनमत निर्माण के लिए करती आई हैं यह सर्वविदित है कि सत्तासीन सरकारें हमेशा से संचार माध्यमों का उपयोग अपने पक्ष में जनमत निर्माण के लिए करती आईं हैं। राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में रेडियो की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है 74 प्रतिशत प्राप्त आंकड़े यह दर्षाते हैं कि रेडियो राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में आज विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सशक्त भूमिका निभा रहा है।


सरकार जनमत निर्माण के लिए कर रही रेडियो का उपयोग : राष्ट्रीय एकता में रेडियो की भूमिका अहम् : वर्ष 1947 में गांधीजी ने कहा था कि ‘मैं रेडियो में शक्ति देखता हूं। भारत में रेडियो के इतिहास में नवंबर, 1941 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस का भारतीयों के नाम संदेश ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ एक ऐतिहासिक प्रसारण था पर यह संदेश रेडियो जर्मनी से प्रसारित किया गया था। रेडियो एक ऐसा माध्यम है, जिसे श्रोता हर प्रकार के काम-काज करते हुए सुन सकता है। रेडियो की संचार माध्यम के रूप में एक बड़ी विशेषता यह है कि इसका लाभ साक्षर-निरक्षर सभी उठा सकते हैं।

शोध में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 87 प्रतिशत लोगों का मत, रेडियो जन-जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। रेडियो के माध्यम से गांव ही नहीं बल्कि शहरों में भी रेडियो लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रहा है। 53 प्रतिशत प्रतिभागी मानते हैं कि सरकार रेडियो का उपयोग अपने पक्ष में जनमत निर्माण के लिए करते आई हैं। इससे यह साफ होता है कि सत्तासीन सरकारें हमेषा से संचार माध्यमों का उपयोग अपने पक्ष में जनमत निर्माण के लिए करती हैं। राष्ट्रीय एकता में रेडियो की भूमिका की बात करें तो आंकड़े और भी चौंकाने वाले सामने आए हैं। 74 प्रतिशत लोगों का मानना है कि रेडियो सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। रेडियो आज भारत के संदर्भ में अपने कार्यक्रमों के माध्यमों से पूरे देश की संस्कृति को प्रसारित कर रहा है।

उक्त आंकड़े वर्धा, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विष्वविद्यालय के संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र के सहायक प्रोफेसर डॉ. धरवेष कठेरिया के नेतृत्व में ‘स्ंाचार के सषक्त माध्यम के रूप में रेडियो (कार्यक्रम ‘‘मन की बात’’ के विषेष संदर्भ में)’ विषय पर किए गए शोध में सामने आया है।

शोध के मुताबिक ‘मन की बात’ कार्यक्रम में रेडियो पर प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रम ‘मन की बात’ के अब तक कुल 12 भाग प्रसारित किए जा चुके हैं। इनमें एंकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा देश की विभिन्न समस्याओं को उठाया गया है जिसमें कला धन, स्वच्छता, सैनिक भाईयों के लिए पेंषन योजना पर विचार और हरियाणा, पंजाब में नशाखोरी जागरूकता, सबके लिए घर जैसे जरूरी विषयों पर अपने विचार जनता के सामने रखे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम के जरिये जनता और सत्ता के बीच संवाद स्थापित करने का भी प्रयास किया है।

शोध अध्ययन में डॉ. कठेरिया के अलावा संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र के पीएच.डी. शोधार्थी निरंजन कुमार, एम.फिल शोधार्थी अनुपम राय, रजनीष कुमार, रत्नसेन भारती, आईसीएसएसआर परियोजना के शोध सहायक नीरज कुमार सिंह एवं अम्बरीष सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

शोध को मूर्त रूप देने के लिए तथ्य संकलन हेतु सौ से अधिक रेडियो श्रोताओं को शामिल किया गया है। सर्वे में 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिला व पुरुष प्रतिभागियों ने अपनी राय दी।

शोध के दौरान यह पाया गया की 74 प्रतिषत उत्तरदाता रेडियो सुनना पसंद करते हैं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि राष्ट्रीय विकास में रेडियो का महत्वपूर्ण योगदान है वहीं कई लोग इसे मनोरंजन के रूप में देखते हैं। रेडियो की विश्वसनीयता आज भी बनी हुई है। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आने से 46 प्रतिषत लोगों का मानना है कि रेडियो श्रोताओं में बढ़ोत्तरी हुई है वहीं शैक्षणिक योग्यता में भी रेडियो का महत्वपूर्ण योगदान है।

शोध का हवाला देते हुए डॉ. कठेरिया ने कहा कि प्रतिभागी मन की बात जैसे कार्यक्रमों के प्रसारण से रेडियो श्रोताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी को स्वीकार करते हैं। तात्पर्य यह है कि मन की बात जैसे कार्यक्रम को प्रस्तुत करने का जिम्मा स्वयं प्रधानमंत्री संभालते हैं। इसलिए इस कार्यक्रम की श्रोता संख्यां में वृद्धि देखी गई। अतः भविष्य में राष्ट्र उपयोगी महत्वपूर्ण प्रसारणों को विषेष या प्रतिष्ठित हस्तियों के द्वारा ही अगर प्रस्तुत किया जाए तो बेहतर होगा।

शोध रिपोर्ट में संचार के आधुनिक माध्यमों के आगमन के उपरांत भी रेडियो की विष्वसनीयता आज भी बरकरार है। 38 प्रतिषत आंकड़े इसे साबित करते हैं, वहीं सांस्कृतिक-सामाजिक विकास में भी रेडियो अपनी भूमिका अदा कर रहा हैं। अध्ययन में प्राप्त 83 प्रतिषत आंकडे़ इस बात की पुष्टि करते हैं। रेडियो अपने योगदान को विभिन्न कार्य क्षेत्रों में बखूबी निभाता हुआ नजर आता है इसीलिए रेडियो सर्वव्यापी बना हुआ हैं।

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