May 28, 2016

जुम्मे को जहाँगीरी घंटा!

आज जुम्मा है, आज का वादा है, लो फिर आ गया जुम्मा, फिर लगेंगी कतारे, फिर लगेगा दांव, धक्का मुक्की खींचा तानी सब होगा यहाँ, गाँव देहात की अनपढ़ जनता नही, ये होंगे समाज के चौथे स्तम्भ के पुरोधर और स्थान होगा अत्यंत संवेदनशील मुख्यमंत्री कार्यालय ,, इधर कुछ साल से समाचार पत्रों के लिए उत्तर प्रदेश में जुम्मे के दिन का ख़ास महत्त्व हैं, उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार में जहाँ प्रदेश उत्तम प्रदेश की तरफ अग्रसर हुआ वहीँ समाचार पत्रों की फ़रियाद के लिए भी नया प्रयोग किया गया, जुम्मे का घंटा, यह अभिनव प्रयास मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है.


मुगल बादशाह जहांगीर ने अपने राज्य के फरियादियों को तुरंत न्याय देने के लिए अपने महल के बाहर एक बड़ा सा ‘घंटा’ लगवाया था। कोई भी फरियादी दिन या रात की परवाह किए बिना जब चाहे तब उस घंटे को बजा सकता था। घंटा बजने पर बादशाह सलामत जहांगीर फरियादी की बात सुनते थे और उसे भरसक न्याय देते थे। उसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश के समाचार पत्रों के लिए जुम्मे का दिन तय हुआ लेकिन यहाँ हर फरियादी नही आ सकता क्योंकि घंटा चार पहरे में है, दो दरवाज़े पार कर, चार चार सुरक्षा कर्मियों को गेटपास दिखा कर फरियादी को अपनी अर्ज़ी देनी होती हैं, यहाँ भी भेद भाव जिसके पास नही गेट पास वो रह गया वंचित। यह सन् 2016 का लखनऊ है सन् 1620 का आगरा नहीं। वो जमाना जहांगीर का था, जिसे बादशाह बनने के लिये किसी वोटबैंक की जरूरत नहीं पड़ी, किसी गरीब या अमीर से कोई वादा नहीं करना पड़ा। हक़ के लिए कभी भी कोई भी जहांगीर के पास जा सकता था, यहाँ तो दिन मुक़र्रर है, जगह भी चार तालों में है !

ऐसे में क्या होगा तुम्हारा मज़लूम समाचार पत्र, सच लिखने वालों, ईमान की बात करने वालों, न तुम किसी गुलिस्तां के फूल, न राजभवन के राजा, न तो बटलर के निवासी, लाप्लास भी तुमसे दूर, तुम तो डालीबाग की डाल की टहनी भी नही, न ही मीरा बाई की मीरा, दारुलशफा जैसी शफ़ाअत भी नही फिर कैसे छापोगे अपना अखबार, दलाली करते नही ट्रान्सफर कैसे करवाओगे, लेखनी की बाते करते हों, ठेके पट्टे है नही, लेख कैसे छापोगे ! जेब में नही दमड़ी, न ही विज्ञापन, अखबार कैसे छापोगे ! तुम्हारे मुकाबिल ठेकेदार, नौकरशाह, बटलर शाह, दारुल शाह, मीरा बाई, राजा, वरिष्ठ गरिष्ठ अखबार के स्वामी है तुम कैसे अख़बार छापोगे। आज़ादी और इमरजेंसी की लड़ाई में छोटे समाचार पत्र ही थे असली और सच्ची खबर के बोल अब तुम कैसे सच बोलोगे, नियम कानून की बात होती नही बड़ों को तो विज्ञापन से दबाया, तुमको कंगाल बना कर मारेंगें, अब कैसे सच छापोगे तुमको भूका मारेंगें।

तुम तो निरहे अख़बार के स्वामी, हो नही व्यवसायी वर्ना जहाँ लोहिया के सिद्धांत की समाजवाद सरकार बनते ही कोई लोहिया का दर्पण लाया तो कोई लोहिया की क्रांति, कहीं नामा बना तो कोई इंक़लाब लाया, लोहिया के सिद्धांत अपनाया नहीं फिर कैसे समाजवाद दोहराओगे ।

यही है ख़बरों के रहनुमा जिन्होंने लाखो करोड़ों कमाया, सरकार बदलेगी तो कोई कमल खिलायेगा तो कहीं बहुजन क्रांति तो कोई बहुजन दर्पण बन कर इन्किलाब लाएगा और एक नया दलित नामा समाज को दिखलायेगा । वाह रे कलमकार कैसी मजबूरी कलम छोड़कर ब्रेड बटर के लिए अखबारों का ही रंग रूप बदल डाला। ऐसे में हुक्मरान तुमसे सियासत न करे तो क्या करे, तुमको दर दर भटकने पर मजबूर न करे तो क्या करे । तुम भी कलम छोड़ कर, ज़मीर का सौदा कर डालो, चिकनी चुपड़ी चापलूसी करके अपने फर्ज़ को बेच डालों लेकिन आँख बंद कर चैन की नींद क्या सो पाओगे ? आज ज़मीर ज़िंदा है तो सुकून से सोते हो, शुगर बीपी से दूर रहते हों, कल अपने को बेचोगे तो चैन से कैसे सोओगे। अभी भी वक़्त है अपनी ताक़त पहचानो, ज़िल्लत सहते रहोगे तो ज़लील होते रहोगे। आज भी एकजुट हो जाओगे तो क्रांति लाओगे वर्ना युहीं टुकड़ों में बट जओगे, आज तो सांस ले रहे हों कल बट बट कर मर जाओगे ।

जुम्मे की बात होती है सजदा कहाँ करते हों ?  रहनुमा तो एक ही हैं उसपर एतबार करते नही, रिज़्क़ देने वाला खुदा है रोटी के लिए दर दर भटकते हों, कलम की मज़बूती करते नही, इधर उधर सर पटकते हों । सर्कुलेशन में हेरा फेरी सब करते हैं तुम क्यों डरते रहते हों । तुम बड़े नही यही सोच सोच कर सहमते हों,, तुममे से ही कोई दिव्य हुआ तो कोई सांध्य (pm) होकर भी सवेरा लाया, किसी ने ऐलान किया तो कोई जन जन तक जागरण लाया, तुम भी जागों, साथ बढ़ो, तुमसे हर तानाशाह हारा है। तुममे से ही किसी की विज्ञापन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की शिकायत पर भारतीय प्रेस परिषद् की टीम सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग भी आई । आखिर 4 साल से दिए जा रहे विज्ञापनों का उनको भी मापदंड देखना था। नियमावली जो बनायीं गयी थी उसको क्यों दरकिनार किया गया इस पर अपनी रिपोर्ट बनानी थी । लेकिन ये टीम भी क्या कर पायेगी इसका जवाब श्याद ही हममे से किसी के पास हो ।

एक तरफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय और माननीय उच्च न्यायालय दोनों ने अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है की विज्ञापन देने में भेदभाव न हों और समान रूप से समाचारपत्रों को विज्ञापन दिया जाय वहीं हम अपनी बात कहने से भी डरते हैं । एक बात स्पष्ट है सरकार कोई भी हों, नियमावली कैसी भी हों, माननीय सर्वोच्च न्यायलय हों या माननीय उच्च न्यायलय का निर्णय, मीडिया हाउस छोटा हो या बड़ा --विज्ञापन सिर्फ और सिर्फ रहमोकरम, जेबगरम, चापलूसी, आदि पर ही मिलता है, ये कथन व्हाट्सएप्प ग्रुप पर किये गए सर्वे में प्रमाणित है, हम कमज़ोर हो चुके है, हमारी एकता में सेंध लग चुकी है । अभी भी वक़्त है जागो वरना मिलेगा सिर्फ घंटा, आज जुमे को बजाते हो कल वो भी नही रह जायेगा, क्यों डरते हों, किससे डरते हों , जो दिखता हमारी तरह है, चलता हमारी तरह है, वो भी डरता है कलम में दम हों तो सब डरते हैं, सोचों साथ क्या लाये थे क्या ले जाओगे, जहांगीर भी गया और लाहौर स्थित जहांगीर की कब्र पर अंकित है, ” हरी घास के सिवा यहां कुछ न हो, क्योंकि यह एक नश्वर निरीह प्राणी की कब्र है और सदा कब्र ही रहेगी।”

अब भी न जागे तो मिट जायेगी हस्ती तुम्हारी !
कल तक कलमकार बन कर जो सम्मान पाते थे !!

आज घंटा बजाने वाले बन कर क्या सम्मान पाओगे ।।

मोहम्मद कामरान
9335907080

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